Saturday, 7 January 2012

प्रस्तावना

वैज्ञानिक अविष्कार एवं उसके चमत्कारों से हम भलीभांति परिचित हैं | महासागर ,आकाश ,अन्तरिक्ष एवं  उपग्रहों की समस्त क्रिया कलापों का ज्ञान हमें विज्ञान के माध्यम से प्राप्त होता रहता है किन्तु आज भी मनुष्य अपनी मृत्यु एवं गम्भीर  बीमारियों के रहस्य एवं उनके कारणों से  अनजान बना हुआ  है | औषधि  हमें तात्कालिक राहत तो दे देती हैं किन्तु उनसे स्थायी हल नहीं मिल पाता है | भारतीय  योगशास्त्र  इसी समस्या के निदान हेतु  हमें अपना बहुमूल्य  मार्ग दर्शन देते हुए इनका स्थायी समाधान  प्रस्तुत करता है |   
योगशास्त्र  की तीन शाखाएं हठयोग ,राजयोग ,एवं वैदिक योग हैं | हठ योग शरीर के शुद्धिकरण ,राजयोग मन की पवित्रता और मानसिक स्थिति को नियंत्रित  करता है | मन का नियंत्रण साधक को अधिमानसिक स्तर तक ले जाता है जिसे आत्मानुभूति  की संज्ञा दी जाती है | वैदिकयोग प्राचीन भारतीय ऋषियों का मानव जाति के लिए सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करता है |योग को केवल स्वस्थ जीवन यापन हेतु एक साधन के रूप में न लिया जाये बल्कि यह उच्चतम आध्यात्मिक जीवन के उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति में भी सहायक मन जाता है। हाथ योग प्रदीपिका के श्लोक संख्या १.१७ में कहा गया है :-
                                               हठस्य  प्रथामांग त्वदासनम पूर्वमुच्य्ते। 
                                               कुर्यातदासनं स्थैर्यमारोग्यं चांगलाघवम।    

हठ योग की छः शाखाएं हैं --द्योति,बस्ति,नेति ,आसन ,मुद्रा एवं प्राणायाम | द्योति के सहारे हम पेट में संचित सभी विषैले पदार्थों को पानी की सहायता से शरीर के बाहर निकालते हैं | बस्ति क्रिया के माध्यम से हम आँतों की सफाई करके शरीर को स्वच्छ और निरापद बनाते हैं | नेति क्रिया से नासिका एवं ललाट के एक हिस्से की सफाई करके उन अंगों को सक्रिय बनाते हैं | आसनों का मुख्य उद्देश्य स्नायु एवं मांसपेशियों को मजबूत बनाना है तथा रीढ़ को अधिक लचीला बनाना है | मुद्राओं का उद्देश्य ग्रन्थियों को स्वस्थ तथा सक्षम रखना है |शारीरिक  स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन बनाये रखने में इन ग्रन्थियों का बड़ा उत्तरदायित्व  है | मानसिक रोग वस्तुतः  मानसिक संघर्ष एवं द्वन्द  से उत्पन्न होते हैं जिसे मानसिक तनाव की संज्ञा दी जाती है |मानसिक तनाव अनेक भयंकर रोगों के कारण स्वयमेव परिलक्षित होते   हैं जैसे रक्तचाप ,हृदयरोग ,उन्माद ,पेट में फोड़े ,अनिद्रा, कैंसर आदि |

  शारीरिक एवं मानसिक बीमारियाँ मुख्यतः चार प्रकार के तनाव पैदा करती हैं :---मानसिक तनाव , हड्डी और मांसपेशियों के तनाव ,आमाशय के तनाव ,ग्रन्थियों के तनाव | आसन एवं प्राणायाम इन सभी तनावों को दूर करने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुए हैं | ये शरीर के बाहरी अंगों से अधिक हमारे आंतरिक अंगों को प्रभावित करते हैं | हमारे शरीर के अंदर हजारों नस- नाड़ियों का जाल  है | योगासन इन नस -नाड़ियों और ग्रन्थियों पर गहरा प्रभाव डालकर हमारे शरीर और मन दोनों को शुद्ध एवं स्वस्थ रखते हैं और इन्हें सक्रिय बनाकर आंतरिक क्रियाओं को सुचारू रूप से संचालित करते हैं | 'स्थिरम सुखम आसनं ' अर्थात आसन हमारे मन और शरीर में स्थिरता लाते  हैं एवं सुख और आनंद की भावना को  जगाते हैं | 

समत्वं योग उच्यते 'परिभाषा योग दर्शन को भलीभांति समझने के लिए पर्याप्त है |जहाँ संतुलन है ,समत्व है ,सामंजस्य है ,लयबद्धता है वहां योग है  | योग पद्धति का उपयोग उपचार पद्धति के रूप में किया जा सकता है किन्तु यह ध्यान रहे कि  योग के लक्ष्य समष्टि से एकात्मकता की उपेक्षा  कदापि न की जाये | स्वामी सत्यानन्द सरस्वती जी के अनुसार "yoga is not an ancient myth buried in oblivion .it is the most valuable inheritence of the present .it is the essential need of today and the culture of tomorrow ."


प्राण का तात्पर्य प्राण ऊर्जा ,प्राण विद्दुत ,जीवनी शक्ति से है 1अध्यात्म एवम  विज्ञान दोनों  इस तथ्य पर एकमत हैं कि प्राण ही जीवन व् चेतना का पर्याय है 1इसके अभाव में समस्त पदार्थ जड़ व मृत माने  जाते हैं 1वनस्पतियों , वृक्षों एवं पुष्पों में प्राण का संचरण सहज रूप में देखा जा सकता है 1इस प्रकार छोटे छोटे जीव  जन्तुओं से लेकर विशालकाय जीवों में प्राण समान रूप से उपलब्ध होता है 1मानव में प्राण  तत्व  सूक्ष्म  एवं रहस्यमय है 1प्राण एक ओर शरीर को नियंत्रित करता है तो दूसरी ओर मन के द्वारा स्वयं नियंत्रित होकर अपने ही विकास को प्रस्तुत करता है 1
प्राण की सर्वब्यापी अभिव्यक्ति के बावजूद मानव ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जहाँ प्राण विद्या अपना यौगिक आधार विकसित करती है 1प्राण का प्रथम कार्य श्वास -प्रश्वास क्रिया का सम्पादन है 1यह अनाहत चक्र को प्रभावित करता है 1इसका स्थान ह्रदय है 1द्वितीय प्राण अपान  है 1 इसका कार्य शरीर के विभिन्न मार्गों से निकलने वाले मलों का निष्कासन करना है और इसका  स्थान गुदा या जननेंद्रिय है 1
प्राण की तृतीय अवस्था को समान प्राण कहा जाता है 1इसके द्वारा  अन्न से लेकर रक्त ,रस और सप्त धातुओं का निर्माण इसी के द्वारा किया जाता है 1इसका मूल स्थान नाभि है जो मणिपुर चक्र को प्रभावित करती है 1प्राण का चौथा आयाम उदान है जिसका कार्य है आकर्षण ग्रहण करना 1अन्न , ,श्वास आदि जो कुछ भी बाहर से ग्रहण किया जाता है वह इसी के द्वारा सम्पन्न होता है 1इसका स्थान कंठ है जो विशुद्धि चक्र को प्रभावित करता है 1व्यान पांचवा प्राण है और इसका कार्य रक्त आदि का संचार तथा स्थानांतरण है 1इसका स्थान सम्पूर्ण शरीर है जबकि कुछ  विद्वान् इसका स्थान नाभि  भी मानते हैं 1यह स्वाधिष्ठान चक्र को प्रभावित करता है 1इन्हीं चक्रों ,ग्रन्थों तथा उपतिकाओं के द्वारा व्यक्तिगत प्राण अन्तरिक्ष के ब्रह्मांडीय प्राण से जुड़ जाते हैं 1यह योग की विभिन्न विधियों से ही सम्भव हो पाता  है  1यही योगविधियाँ प्राण को व्यापक और विकसित करके परिष्कृत करती हैं 1यही यौगिक प्राण विद्या का आधार है जो सही ढंग से अपनाए जाने पर प्राण को शुद्ध करती है 1इसके पश्चात्  प्राणायाम की विधियों के ज्ञान की आवश्यकता पडती है जो प्राण केन्द्रों को व्यवस्थित एवं नियंत्रित करने के साथ प्राण प्रवाह को नियमित भी करती है 1इसके अतिरिक्त धारणा एवं ध्यान की कतिपय  क्रियाएं भी योंगिक  प्राण विद्या के उच्चस्तरीय उद्देश्य को सार्थक बनाती हैं 1यौगिक प्राण विद्द्या की उक्त सभी विधियों द्वारा प्राण ओजस ,तेजस व वर्चस में स्वाभाविक अभिवृद्धि प्रदान करती हैं और अंततः हमें आत्मानुभूति की ओर  अग्रसर करतीं है  1 

योगाभ्यास जिसमें आसन ,प्राणायाम ,ध्यान तीनों सम्मिलित हैं , को प्रारम्भ करते समय किंचित अनिक्षा एवं कठिनाई महशूस हो सकती है किन्तु जैसे जैसे आप दृढ़तापूर्वक इसे करते रहेंगे आपकी उपरोक्त समस्या स्वयं दूर हो जायगी एवं इस दौरान आपको  अतिशय आनंद का अनुभव होगा । मैं स्वयं इस परिस्थिति से गुजर चुका हूँ ।स्वर्ण जयंती पार्क जो सेक्टर- २१, इंदिरा नगर, लखनऊ में स्थित है , में भारतीय योग संस्थान के तत्वावधान में संचालित दैनिक योगाभ्यास को मैं प्रारम्भ में प्रायः   दूर से देखता था ।धीरे धीरे साहस करके एक दिन उनके पास गया और पूरे समय तक बैठकर उसका निरीक्षण  करता रहा और योगाभ्यास समाप्त होने के पश्चात संचालक महोदय  से  योगाभ्यास में  सम्मिलित होने की  अपनी इच्छा निवेदित की । संचालक की स्वीकृति के पश्चात मैं नियमित रूप से योगाभ्यास करने लगा ।प्रारम्भ में कुछ कठिनाई अवश्य महशूस हुई किन्तु धीरे धीरे मुझे इस क्रिया में अत्यधिक आनंद की प्राप्ति होने लगी । अब तो ऐसा लगने लगा है कि दैनिक क्रिया का कोई अन्य कार्य भले छूट जाये किन्तु योगाभ्यास नहीं छूटता है । यदि कभी ऐसा होता भी है तो पूरे दिन यही आभास होता रहता है जैसे कोई महत्वपूर्ण क्रिया छूट गयी है / 

आशा है आप मेरे उपरोक्त अनुभव का अनुसरण करेंगे तथा योगाभ्यास को अपनाकर अपने जीवन को भी  सरल व सुगम बनायेंगे । इस पुस्तक को लिखने का एकमात्र प्रयोजन भी यही है कि जन सामान्य को सरल ढंग से योगाभ्यास के प्रति जागरूक किया जाये और इस क्रिया की  सरलतम विधि से उन्हें परिचित कराया जा सके ।उपरोक्त तथ्यों को दृष्टिगत करते हुए योग के सामान्य सिद्धांतों को सरल एवं कुशलतापूर्वक अपने दैनिक जीवन में लाये जाने के उद्देश्य से इस पुस्तक की रचना की गयी है |  सभी रोगमुक्त हों ,दुर्बल सबल बनें एवं सभी आंतरिक एवं बाह्य दोनों रूप से स्वस्थ हों तथा प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए योग के माध्यम से अपने चरम उद्देश्य की प्राप्ति कर सकें ,यही मेरी अभिलाषा है | मानसिक स्वास्थ्य की आवश्यकता तथा स्वास्थ्य के सूत्रों के माध्यम से पाठकों को उनके सामान्य जीवन में जीने की प्रेरणा दी गयी है जिससे  वे विभिन्न शारीरिक व मानसिक रोगों से सहज  मुक्ति पा सकें |आशा है कि पाठक इससे स्वयं लाभान्वित होंगे तथा  इसमें दी गयी विधियों को प्रामाणिक रूप से समझकर समाज एवं देश का कल्याण करने में पूर्ण समर्थ हो सकेंगे | 
 अंत में मैं भारतीय योग संस्थान, नई दिल्ली का आभार व्यक्त करता हूँ जिनके मार्ग दर्शन में मुझे यह सब सीखने का सुअवसर प्राप्त हुआ । डाo प्रणव पांड्या निदेशक ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान हरिद्वार   का भी मैं विशेष रूप से आभारी हूँ जिनकी प्रेरणा ने मुझे निरंतर  सम्बल प्रदान किया है । ब्रह्मलीन पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ,शांतिकुञ्ज हरिद्वार की पुण्य स्मृति में समर्पित करते हुए सम्प्रति अपने सुधी पाठकों के उपयोगार्थ यह पुस्तक प्रस्तुत कर रहा हूँ /
                                 सर्वे  भवन्तु  सुखिनः  ,सर्वे  सन्तु  निरामयाः  |
                              सर्वे कल्याण पश्यन्तु,मा कश्चिद दुःख भाग्भवेत |