Wednesday, 26 June 2013

अर्धचन्द्रासन

          अर्धचन्द्रासन का अर्थ होता है आधा और चन्द्रासन का अर्थ  चन्द्र के समान किया गया आसन / इस आसन को करते समय शरीर की स्थिति अर्धचन्द्र के समान दृष्टिगत  होती  है/ इसलिए इसे अर्धचन्द्रासन कहते हैं \ इस आसन की स्थिति त्रिकोण के समान बनती है / इसीलिए इसे कुछ लोग त्रिकोणासन  भी कहते हैं /  यह आसन प्रायः खड़े होकर किया जाता है /
विधि :-
सर्वप्रथम दोनों पैरो की  एड़ी एवं पंजो को मिलाकर खड़े हो जाये तथा दोनों हाथ कमर से सटे हुए गर्दन सीधी और नजरें सामने रखें ! अब दोनों टांगों को तान कर पैरों के पंजो को फैलाएं ! इसके बाद दायें हाथ को ऊपर उठाते हुए कंधे के समानांतर लायें फिर अपने  बाजू को  ऊपर उठाते हुए कान के सटा दें / इस दौरान ध्यान रहे कि बायाँ हाथ आपकी कमर से  सटा रहे / फिर  दायें हाथ को ऊपर सीधा कान और सिर से सटा हुआ रखते हुए  कमर से बाई ओर धीरे धीरे  झुकाते जायं / इस दौरान आपका बायाँ हाथ स्वतः नीचे खिसकता  जायेगा /  यह ध्यान रहे कि बाएं हाथ की हथेली बाएं पैर से अलग न हटने पायें / जहाँ तक हो सके बाएं ओर झुकें, फिर इस अर्ध चन्द्र की स्थिति में ३०-४० सैकड़ों तक रहें / वापस आने के लिए धीरे-धीरे  पुनः सीधे खड़े हो  जाएँ / अब  कान और सिर से सटे हुए हाथे को पुनः हाथों  के सामानांतर ले आयें तथा  हथेली को भूमि की ओर सरकाते हुए हाथ को कमर के सटा लें / इस प्रकार  दायें हाथ से बायीं ओर  झुक कर किये गए अर्धचन्द्रासन की  यह पहली स्थिति है / अब इसी आसन को बाएं हाथ से दायी ओर झुकते हुए करे तत्पश्चात पुनः विश्राम की अवस्था में आ जाये/ उक्त आसन को ४-५ बार करने से विशेष  लाभ होगा / 
 लाभ :- 
-इस आसन को नियमित रूप से करने से घुटने के ब्लैडर, गुर्दे, छोटी आंत लीवर, छाती, फेफड़े एवं गर्दन तक का भाग एक साथ प्रभावित होता है, जिससे ये अंग निरोगी व स्वस्थ रहते हैं ! श्वास , उदर , पिंडलियों, पैरों, कंधो, कुहनियो और मेरूदंड सम्बन्धी रोगों में लाभ मिलता है / यह  आसन कटि प्रदेश को लचीला बनाकर पार्श्व भाग की चर्बी  को कम करता है/पृष्ठ भाग की मासपेशियों पर बल पड़ने से उनका स्वास्थ सुधरता है और छाती का विकास करता है / 
 सावधानी :-
-इस आसन को खाली पेट ही करें तथा  यदि कमर में दर्द हो तो यह आसन योग चिकित्सक की सलाह अनुसार ही करें /