Sunday, 18 March 2012

लोम अनुलोम

लोम अनुलोम प्राणायाम अत्यंत प्रभावकारी एवं सरल प्राणायाम है । प्रातःकाल सूर्योदय के पूर्व एवं सायंकाल सूर्योदय के पश्चात प्रदूषण रहित स्थान पर एकांत में इस प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए ।
विधि :----
१- पद्मासन अथवा सुखासन जिसमें भी सुविधाजनक लगे बैठ जाएँ ।
२- कमर और गर्दन को सीधा रखते हुए दोनों आँखें बंद कर लें ।
३- अब दाहिने हाथ के अंगूठे को दाहिनी नासिका पर और छोटी अंगुली को बायीं नासिका पर रखें ।
४- अपनी सांसों को सामान्य कर लें और अपने  ध्यान को दोनों भौहों के बीच केन्द्रित करें  ।
५- अब बायीं नासिका से धीरे धीरे श्वास भरें और आतंरिक कुम्भक लगा कर कुछ देर तक श्वास को रोकें ।
६- अब अगूठे को ढीला करते हुए दाहिनी नासिका से धीरे धीरे श्वास को बाहर निकालें ।
७- बाह्य कुम्भक लगाते  हुए श्वास को यथाशक्ति रोकें ।
८- अब दाहिनी नासिका से श्वास भरें और बायीं नासिका से धीरे धीरे बाहर निकालें ।
९-  इस प्रकार से लोम अनुलोम का एक चक्र पूर्ण हो गया । 
१० -अब इसी क्रिया को उपरोक्त विधि से ५ से १० बार तक दुहरायें  । 
सावधानी :---
लोम अनुलोम करते समय मन को शांत एवं स्थिर रखें तथा श्वास भरने की क्रिया अत्यंत धीरे धीरे करें । लोम अनुलोम में श्वास को अंदर एवं बाहर रोकने में अत्यंत सावधानी रखें ।सामर्थ्य के अनुरूप ही आतंरिक एवं बाह्य कुम्भक लगायें । किसी अंग विशेष में दर्द की स्थिति में इसे कदापि न करें ।
परिणाम :---
१- लोम अनुलोम का नियमित अभ्यास करते रहने से श्वास सम्बन्धी बीमारी से मुक्ति मिल जाती है ।
२- इस प्राणायाम से चित्त शांत एवं मन स्थिर रहता है ।
३- जुकाम की समस्या सदैव के लिए दूर हो जाती है ।
४- इससे ब्लड प्रेशर सामान्य रहता है तथा सर दर्द दूर करने में भी सहायक होता है ।
५- यह प्राणायाम मोटापा दूर करने भी सहायक माना गया है  ।

Saturday, 10 March 2012

कपालभाति

कपाल का अर्थ खोपड़ी तथा भाति का तात्पर्य चमक अथवा प्रकाश  होता है । कपालभाति में श्वसन मंद होता है, परन्तु उच्छ्वसन प्रबल होता है ।प्रत्येक उच्छ्वसन के बाद कुम्भक के सूक्ष्म कण होते हैं ।
विधि ;----
१- पद्मासन अथवा सुखासन में सुबिधानुसार आसन पर  बैठ जाएँ ।
२- इस दौरान अपनी पीठ को सीधा  एवं कड़ा रखें ,धड की ओर सिर थोड़ा झुकाए रखें ।जालन्धर बंध लगा लें ।
३- अब दाहिने हाथ को नासिका पर ले जाएँ और अंगूठे को दाहिने नासिका पर एवं अंगुली को बाएं नासिका पर रखते हुए दबाव बनाएं ।
४- बायीं नासिका को पूरी तरह  बंद करें परन्तु दाहिनी नासिका को थोडा खुला रखें ।
५- दाहिनी नासिका से तीव्रता से श्वास भरें और उसी तरह छोड़ें ।यह क्रिया  १०-१२ बार करते रहें ।
६- अब दाहिनी नासिका बंद करें और बायीं नासिका को थोडा खोलें और भस्त्रिका के उतने ही चक्र दुहरायें ।
७- अब नासिका से अँगुलियों को हटा लें ।
८- इस क्रिया को सामर्थ्य के अनरूप ४-५ बार करें ।
९-   गहरी और लम्बी श्वास लें ।
१० -अब अपनी सासों  को सामान्य कर लें एवं श्वसन में लेट जाएँ ।
परिणाम :---
१- इस प्राणायाम से यकृत ,प्लीहा ,पाचनग्रन्थि तथा उदर की मांसपेशियां  अधिक क्रियाशील और शक्तिशाली बन जाती हैं ।
२- पाचनशक्ति बढ़ जाती है तथा भूख अधिक लगने लगती है ।
३- इस प्राणायाम से नासूर बिलकुल सूख जाता है ।
४- आँखों को ठंडक  महशूस होती है और चित्त को प्रसन्नता का अनुभव होने लगता है ।
५- इस प्राणायाम  को नियमित रूप से करने से सर्दी जुकाम की समस्या उत्पन्न नहीं होती है ।  
सावधानी :-- 
१- दुर्बल शरीर अथवा कमजोर व्यक्ति को यह प्राणायाम वर्जित है ।
२- जो कान एवं आँख  की किसी भी प्रकार की समस्या से ग्रस्त हों ,उन्हें भी यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए ३- उच्च रक्त चाप अथवा निम्न रक्त चाप के रोगी को भी यह वर्जित है ।
४- यदि नासिका से रक्तश्राव अथवा कान में दर्द का अनुभव होता हो तो इस प्राणायाम को तुरंत रोक दें ।
५- इस प्राणायाम को साफ सुथरे स्थान पर जहाँ शुद्ध वायु मिलती हो करना चाहिए ।

Sunday, 4 March 2012

भ्रामरी प्राणायाम

भ्रामरी का अर्थ बड़ी काली मधुमक्खी होता है ।इस प्राणायाम के दौरान भंवरे की तरह गुनगुनाने की ध्वनि  निकलने के कारण इसे भ्रामरी प्राणायाम की संज्ञा दी गयी है ।यह प्राणायाम सूर्योदय के पूर्व अथवा सूर्यास्त के पश्चात किया जा सकता है ।
विधि --
१ --पद्मासन अथवा सुखासन में आराम से बैठ जाएँ और आँखों को पूर्णतयः बंद रखें  तथा मन और चित्त को शांत रखें ।
२- इस दौरान मेरुदंड को बिलकुल सीधा रखें।अंगूठा और अनामिका को क्रमशः नाक के दायें एवं बाएं छिद्र पर रखें ।
३- नासिका के दोनों छिद्रों से पूरी साँस भरें और पांच सेकेण्ड तक जालन्धर और मूल बंध में श्वास को रोकें ।
४- अब बंध छोड़ दें एवं दोनों कानों को अँगुलियों से बंद करें ।
५- अपने दांतों को खुले रखें  किन्तु होठ बंद रहें  ।
६- अब दोनों नाक छिद्रों से पूरी श्वास छोड़ दें किन्तु धीरे धीरे मधुमक्खी की तरह गुनगुनाते हुए ।
७- इस दौरान अपनी चेतना को गुनगुनाहट के कम्पन के साथ सुदृढ़ करें ।
८- उक्त क्रिया से एक चक्र पूर्ण हो जाता है ।
९- इस अभ्यास को ५ से १० बार करें ।
१०- श्वास के लिए कोई अनुपात नहीं निर्धारित है बल्कि अपने सामर्थ्य के अनुसार भर सकते हैं ।
परिणाम ---
१- मस्तिष्क में रक्त जमाव की स्थिति में आराम पहुंचाता  है एवं इसे प्रभावकारी ढंग से दूर करता है ।
२- यह अनिद्रा और क्रोध को दूर करता है ।
३- यह उक्त रक्त चाप को जो मानसिक अशांति के कारण उत्पन्न हुआ हो ,को घटाता है ।
४- क्रोध एवं चिंता के कारण हुए मस्तिष्क तनाव को घटाने में यह सहायक होता है ।
५- किसी भी प्रकार के सिर दर्द को दूर कर अच्छी नींद लाने  में अत्यधिक सहायक होता है ।

भस्त्रिका प्राणायाम

भस्त्रिका  का अर्थ भट्टी के लिए प्रयोग में लायी जाने वाली धौकनी है । लुहार की धौकनी की तरह यहाँ बल पूर्वक  हवा को भीतर से  बाहर की  ओर निकाली  जाती है ।
विधि :---
१- सिद्धासन अथवा पद्मासन में बैठकर मेरुदंड को सीधा रखें ।
२-दाहिने  अंगूठे को बायीं  नासिका पर रखें ।
३बायाँ  हाथ बाएं घुटने पर चिन्मयी मुद्रा में रखिये ।
४- नासिका का दाहिना छिद्र दाहिने  अंगूठे से बंद कीजिये और अनामिका से नाक  का बायाँ छिद्र बंद कीजिये ।
५_-दाहिने अंगूठे से दबाते हुए नाक का दाहिना छिद्र बंद कीजिये ।
६- बाएं नाक छिद्र से २० बार तेजी से श्वास लीजिये और छोडिये ।अंत में बाएं   छिद्र से पूरा श्वास लेकर दोनों छिद्रों को बंद करते हुए जालन्धर बंध में ११ सेकेण्ड तक अंतर कुम्भक कीजिये ।
७- अब बाएं छिद्र से धीरे धीरे २२ सेकेण्ड में श्वास को छोडिये ।
८- यही अभ्यास दायें छिद्र से भी कीजिये ।
९- अब दोनों छिद्रों से भी जल्दी जल्दी श्वास को भरें और छोड़ें ।
१० --अंत में दोनों छिद्रों से श्वास लेकर दोनों छिद्रों को बंद कीजिये और जालन्धर बंध में ११ सेकेण्ड तक  श्वास को अंतर कुम्भक में रोकिये ।
११ -अब जालन्धर बंध हटाते हुए २२ सेकेण्ड में श्वास को धीरे धीरे एक लय में छोडिये ।
१२- भस्त्रिका प्राणायाम का यह एक चक्र पूरा हुआ ।
१३- इस क्रिया को कम से कम ५ बार कीजिये ।
सावधानी :--
१- प्रारम्भ में यह क्रिया धीरे धीरे शुरू करें और बाद में नियंत्रण के साथ गति और समय में वृद्धि करें ।
२- इसे करते समय चेहरे पर अनावश्यक दबाव न दें बल्कि शरीर को कड़ा रखें और शिथिलता का अनुभव करें
३- श्वास की प्रक्रिया के समय और उसे रोकने के समय ध्यान मूलाधार चक्र पर केन्द्रित होना  चाहिए ।
४- जो व्यक्ति हृदय रोग  या उच्च रक्त चाप से पीड़ित हों वे कृपया  यह अभ्यास न करें बल्कि निम्न रक्त चाप से पीड़ित को यह अवश्य करना चाहिए ।
५- प्रातः या सायंकाल कभी भी ख़ाली पेट इसे किया जा सकता है  ।
परिणाम _--
१- इस अभ्यास से शरीर में गर्मी का अनुभव होता है एवं जाड़े में सर्दी कम लगती है ।
२- यह प्राणायाम शरीर की चर्बी कम करने में सहायक होता है ।
३- गले की सूजन में आराम पहुचता है और जठराग्नि तेज होती है ।
४- यह कार्बन आक्साइड समाप्त कर फेफड़ों को शुद्ध करता है ।
५- रक्त चाप को नीचे से ऊपर की ओर बढ़ाता है ।
६- दमा और सर्दी जुकाम ठीक करने में सहायक माना गया है ।
७- मोटापा घटाने में मदद करता है ।
८- सिर-दर्द और अनिद्रा दूर करता है ।
९- इससे पेट की गैस कम होती है तथा कब्जियत भी दूर होती है ।

Saturday, 3 March 2012

शीतली प्राणायाम

शीतल शब्द का अर्थ है ठंडा । यह प्राणायाम शरीर के समस्त अवयवों को शीतलता प्रदान करता है इसीलिए इसका नाम शीतली प्राणायाम रखा गया है । प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व अथवा सायं सूर्योदय के पश्चात इस आसन को खुले वातावरण में करना चाहिए /
विधि :------
१;---पद्मासन अथवा सुखासन जिसमें भी सुबिधा हो , स्थिरतापूर्वक बैठ जाएँ ।
२:----सिर के समानांतर अपने पीठ को सीधा रखें और दोनों हाथों की हथेलियों को उल्टा करके ज्ञान मुद्रा में अपने  घुटने पर रखें    ।
३-अब अपने मुहं को इस प्रकार से खोलें कि दोनों होंठों के मध्य गोल  आकृति बन जाये ।
४:--अपनी जीभ को ऊपर की ओर मोड़ते हुए इस प्रकार उठायें कि जीभ तालू  के ऊपरी भाग को स्पर्श करे तथा जीभ के किनारे और अग्र भाग दांतों को छूते रहें ।
५:--अब मुड़ी हुई जीभ को होठों के बाहर निकालें और फुफुफ्सों को पूरी तरह भरने के लिए सिसकार  की ध्वनि  के साथ मुड़ी हुई जीभ से हवा को अंदर की ओर खींचें ।ऐसा करते समय ऐसा अनुभव  होना चाहिए कि हवा किसी नली के सहारे अंदर की ओर खींची जा रही है । पूर्ण श्वसन के पश्चात जीभ को अंदर कर  लें ।
६:--पूर्ण श्वसन के बाद सिर को गर्दन के पिछले भाग से धड की ओर झुकाएं और अपने चिबुक को हंसुली और सीने की हड्डी के थोडा ऊपर मध्य भाग में  इस प्रकार स्थिर करें कि जालन्धर बंध की मुद्रा बन जाये ।
७:--अब मूल बंध का अभ्यास करते हुए ५ सेकेण्ड  तक श्वास को रोकें रखें  ।
८:--उज्जायी प्राणायाम की तरह नासिका से वायु को छोड़ने की ध्वनि  के साथ धीरे धीरे श्वास को छोड़ें ।
९:--इस प्रकार शीतली प्राणायाम का एक चक्र पूरा हो जाता है ।
१० :--अब सिर को उठा लें और ५ से १० मिनट तक इस माला की पुनरावृत्ति करें ।
परिणाम :-- 
इस प्राणायाम से सम्पूर्ण शरीर यंत्र को ठंडक प्राप्त होती है और कान एवं नेत्र को शक्ति मिलती  है । यह मंद ज्वर और पित्त की  अवस्था में विशेष लाभदायक है ।यह यकृत एवं प्लीहा को क्रियाशील बनाता है  तथा प्यास बुझाकर पाचनशक्ति को बढ़ाता है ।
सावधानी :-
-उच्च रक्त चाप के व्यक्तियों को अंतर र्कुम्भ्क नहीं करना चाहिए और हृदय रोग  से पीड़ित साधक को भी यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए ।

Monday, 20 February 2012

नाड़ी शोधन प्राणायाम

नाड़ी -प्राण अथवा ऊर्जा के मार्ग के लिए नस या धमनी के समान शरीर का नलिका रूप अवयव है ।शरीर में सबसे अंदर की तह को शिरा कहते हैं और बीच की तह को धमनी तथा  शरीर के बाहरी तह को नाड़ी कहते हैं । शोधन का तात्पर्य पवित्र अथवा स्वच्छ करना होता है ।इस प्रकार नाड़ी शोधन प्राणायाम का मुख्य उद्देश्य नाड़ी को शुद्ध करना होता है ।
विधि ----
१ -आसन पर पद्मासन अथवा सिद्धासन में सुविधानुसार बैठ जाएँ ।
२- अपनी पीठ को सीधा और कड़ा रखें तथा सिर को धड की ओर नीचे ले  लायें ।सीने की हड्डी के ठीक ऊपर हंसुलिओं के मध्य कटाव में चिबुक को  स्थिर करें एवं  तत्पश्चात  जालन्धर बंध लगायें ।
३- अब बायीं बांह को फैला  दें और बाएं घुटने पर बायीं कलाई का पिछला भाग टिका दें । ज्ञानमुद्रा की स्थिति बनाएं और आँखों को पूर्णतया  बंद रखें  ।
४- दाहिने  अंगूठे से नाक का दाहिना छिद्र बंद करें और अनामिका से बायाँ छिद्र बंद करें ।
५- अब दाहिने अंगूठे से दबाते हुए अपना दाहिना नाक छिद्र बंद करें और बाएं नाक छिद्र से अपने फेफड़े की सारी हवा निकाल दें ।
६- अब बाएं नाक छिद्र से धीरे धीरे श्वास खींचे और ११ सेकेण्ड तक गिनती गिनते हुए फेफड़े में हवा भरें ।
७- बायाँ नाक छिद्र दाहिने  हाथ की अनामिका से बंद करें ताकि दोनों नाक छिद्र बंद हो जाएँ ।
८- लगभग ११ सेकेण्ड तक हवा को फेफड़े में रोके रखें  अर्थात अन्तरंग कुम्भक करते रहें ।
९- अब धीरे धीरे  दाहिने अंगूठे को उठाकर दाहिने नाक छिद्र को खोलें और ११ सेकेण्ड में उससे पूरी हवा बाहर निकाल दें ।
१०- अब अपने अंगूठे से दाहिना  नाक छिद्र बंद कर दें ताकि दोनों नाक छिद्र बंद हो जाएँ ।
११- बहिरंग कुम्भक में ११ सेकेण्ड तक दोनों नाक छिद्र बंद रखें ।
१२- अब अपना अंगूठा धीरे से उठाकर दाहिना नाक छिद्र खोलें और दाहिने नाक छिद्र से ११ सेकेण्ड गिनते हुए श्वास खींचें । [पूरक क्रिया ]
१३- अब अंगूठे से दाहिना नाक छिद्र दबाएँ ताकि दोनों नाक छिद्र बंद हो जाएँ ।
१४- ११ सेकेण्ड तक हवा फेफड़ों में रोकें [अन्तरंग कुम्भक ]।११ सेकेण्ड की गिनती मन ही मन गिनें ।
१५- अब अनामिका अंगुली को उठाते हुए बायाँ नाक छिद्र खोलें और २२ सेकेण्ड तक अपने बाएं नाक छिद्र से श्वास को बाहर  निकालें ।
१६- अब बिना रुके बाएं नाक छिद्र को अनामिका से बंद करें और हवा को ११ सेकेण्ड तक बाहर रोकें [बहिरंग कुम्भक ]
१७- जब यह चक्र समाप्त हो जाये ,तब आप प्रारम्भिक स्थिति में आ जाएँ ।
१८- इस प्रकार नाड़ी शोधन प्राणायाम का एक चक्र समाप्त होता है ।
१९- बिना रुके हुए दूसरी बार यही क्रिया  शुरू करें ।
स्मरणीय बिंदु ---
१- -नाड़ी शोधन प्राणायाम का अभ्यास यथासम्भव शांतिपूर्ण और हवादार स्थान में ही करें ।बहुत अधिक सर्दी में इसे न करें। 
    २- इस अभ्यास के दौरान मेरुदंड को सीधा करके एवं तनकर बैठना चाहिए तथा अत्यंत सावधानी से ११ से २२ सेकेण्ड की गिनती करें ।
३- श्वास को यथासम्भव  नियंत्रण में रखें ।उसे तेजी के साथ नाक छिद्रों में ना जाने दें और न ही तेजी से बाहर निकालें ।
४- चिन्मयी मुद्रा में अपना बायाँ हाथ शिथिलतापूर्वक बाएं ठेहुने पर रखें और दाहिने हाथ का अंगूठा दाहिने छिद्र पर और अनामिका बाएं छिद्र पर रखें एवं इस दौरान आँखों को पूरी तरह से बंद रखें ।
५- यदि पद्मासन में कोई कठिनाई महशूस हो तो आप वज्रासन या सुखासन में बैठकर इसे कर सकते हैं ।
६- जो व्यक्ति उच्च रक्त चाप या ह्रदय रोग से पीड़ित हैं उन्हें श्वास रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए तथा जो मंद रक्त चाप से पीड़ित हैं वे श्वसन के बाद अवरोध [अंतर्कुम्भक ] के साथ  इसे कर सकते हैं ।बुखार की दशा में भी यह वर्जित है। 
परिणाम ---
१- स्वाभाविक श्वास क्रिया की अपेक्षा नाड़ी शोधन में रक्त को प्राण वायु की पूर्ति अधिक होती है जिससे नाड़ियाँ  शुद्ध एवं शांत हो जाती हैं ।मन स्थिर और निर्मल हो जाता है ।
२- रासायनिक प्रतिक्रिया की पद्धति में तेजी एवं वृद्धि लाता है ।
३- विषाक्त तत्व यथा कार्बन आक्साइड एवं अन्य अशुद्धियों को दूर कर शरीर को शुद्ध बनाता है ।
४- इसे नियमित रूप से करने पर सिर दर्द पूरी तरह से समाप्त हो जाता है ।
५- घबराहट ,चिन्ता  और अनिद्रा पर काबू पाने में यह सहायक माना जाता है ।

Sunday, 5 February 2012

सर्पासन

सर्पासन जैसाकि नाम से ही ध्वनित होता है कि इस आसन में सर्प जैसी आकृति बनायीं जाती है । यह सरल आसनों की श्रृंखला का एक अत्यंत लाभदायक आसन है /
विधि :-
१- सर्वप्रथम आसन पर पेट के बल सीधे लेट जाएँ और अपनी सांसों को क्रमशः सामान्य कर लें  ।
२- अपने दोनों पैरों को आपस में मिला लें और पैरों को नीचे की ओर यथाशक्ति तानें ।
३- अब अपने दोनों हाथों को पीठ पर ले जाते हुए हाथों की अंगुलिओं को आपस में फंसाकर मिला लें ।
४- एक लम्बी गहरी सांस भरें और उसे अंदर की ओर रोकते हुए भरी हुई साँस की स्थिति में अपने सिर और दोनों पैरों को आसन से थोडा ऊपर उठाकर सर्प की तरह दायें बाएं लोटपोट करें ।
५-लोटपोट करते समय दोनों पैर एक दूसरे से मिले और तने  रहें एवं दोनों हाथों की अंगुलियाँ भी आपस में मिली रहें ।
६-यदि  सांस लेने की आवश्यकता महशूस हो तो लोटपोट की क्रिया को दाहिने करवट में  रोक दें ।
७- कुछ देर तक सांसों को सामान्य कर लें और फिर से श्वास भरते हुए इसी क्रिया को एक बार करें ।
८- अब दाहिने हाथ को ऊपर करते हुए दाहिनी करवट लेकर पीठ के बल लेट जाएँ और शवासन में थोड़ी देर    तक विश्राम करें ।
९- शवासन में विश्राम के पश्चात आसन पर पुनः उठकर बैठ जाएँ ।
सावधानी :---सर्पासन की क्रिया उतनी देर तक ही करें जितनी देर तक आप सांस को आसानी से रोक सकें । इस क्रिया के दौरान आपके हाथ और पैर दोनों तने रहेंगे और इस दौरान सिर को आसन से थोडा ऊपर उठाये रखेंगे । इस क्रिया के कारण यदि किसी अंग विशेष में दर्द महशूस हो तो इस क्रिया को तुरंत रोक दें और शवासन में विश्राम करें ।
परिणाम :---
१- इस आसन से रीढ़ की हड्डियाँ मजबूत होती हैं तथा उनमें लोच पैदा होती है ।
२- आँतों में चिपके हुए मल स्वयमेव बाहर निकल जाते हैं ।
३- इस आसन को नियमित रूप से करने पर कब्ज की समस्या सदैव के लिए दूर हो जाती है ।
४- इस आसन के करने से शरीर सुडौल व आकर्षक बनता है ।
५- इस आसन से शरीर में स्फूर्ति पैदा होती है और आलस्य भी दूर हो जाता है ।

Saturday, 7 January 2012

प्रस्तावना

वैज्ञानिक अविष्कार एवं उसके चमत्कारों से हम भलीभांति परिचित हैं | महासागर ,आकाश ,अन्तरिक्ष एवं  उपग्रहों की समस्त क्रिया कलापों का ज्ञान हमें विज्ञान के माध्यम से प्राप्त होता रहता है किन्तु आज भी मनुष्य अपनी मृत्यु एवं गम्भीर  बीमारियों के रहस्य एवं उनके कारणों से  अनजान बना हुआ  है | औषधि  हमें तात्कालिक राहत तो दे देती हैं किन्तु उनसे स्थायी हल नहीं मिल पाता है | भारतीय  योगशास्त्र  इसी समस्या के निदान हेतु  हमें अपना बहुमूल्य  मार्ग दर्शन देते हुए इनका स्थायी समाधान  प्रस्तुत करता है |   
योगशास्त्र  की तीन शाखाएं हठयोग ,राजयोग ,एवं वैदिक योग हैं | हठ योग शरीर के शुद्धिकरण ,राजयोग मन की पवित्रता और मानसिक स्थिति को नियंत्रित  करता है | मन का नियंत्रण साधक को अधिमानसिक स्तर तक ले जाता है जिसे आत्मानुभूति  की संज्ञा दी जाती है | वैदिकयोग प्राचीन भारतीय ऋषियों का मानव जाति के लिए सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करता है |योग को केवल स्वस्थ जीवन यापन हेतु एक साधन के रूप में न लिया जाये बल्कि यह उच्चतम आध्यात्मिक जीवन के उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति में भी सहायक मन जाता है। हाथ योग प्रदीपिका के श्लोक संख्या १.१७ में कहा गया है :-
                                               हठस्य  प्रथामांग त्वदासनम पूर्वमुच्य्ते। 
                                               कुर्यातदासनं स्थैर्यमारोग्यं चांगलाघवम।    

हठ योग की छः शाखाएं हैं --द्योति,बस्ति,नेति ,आसन ,मुद्रा एवं प्राणायाम | द्योति के सहारे हम पेट में संचित सभी विषैले पदार्थों को पानी की सहायता से शरीर के बाहर निकालते हैं | बस्ति क्रिया के माध्यम से हम आँतों की सफाई करके शरीर को स्वच्छ और निरापद बनाते हैं | नेति क्रिया से नासिका एवं ललाट के एक हिस्से की सफाई करके उन अंगों को सक्रिय बनाते हैं | आसनों का मुख्य उद्देश्य स्नायु एवं मांसपेशियों को मजबूत बनाना है तथा रीढ़ को अधिक लचीला बनाना है | मुद्राओं का उद्देश्य ग्रन्थियों को स्वस्थ तथा सक्षम रखना है |शारीरिक  स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन बनाये रखने में इन ग्रन्थियों का बड़ा उत्तरदायित्व  है | मानसिक रोग वस्तुतः  मानसिक संघर्ष एवं द्वन्द  से उत्पन्न होते हैं जिसे मानसिक तनाव की संज्ञा दी जाती है |मानसिक तनाव अनेक भयंकर रोगों के कारण स्वयमेव परिलक्षित होते   हैं जैसे रक्तचाप ,हृदयरोग ,उन्माद ,पेट में फोड़े ,अनिद्रा, कैंसर आदि |

  शारीरिक एवं मानसिक बीमारियाँ मुख्यतः चार प्रकार के तनाव पैदा करती हैं :---मानसिक तनाव , हड्डी और मांसपेशियों के तनाव ,आमाशय के तनाव ,ग्रन्थियों के तनाव | आसन एवं प्राणायाम इन सभी तनावों को दूर करने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुए हैं | ये शरीर के बाहरी अंगों से अधिक हमारे आंतरिक अंगों को प्रभावित करते हैं | हमारे शरीर के अंदर हजारों नस- नाड़ियों का जाल  है | योगासन इन नस -नाड़ियों और ग्रन्थियों पर गहरा प्रभाव डालकर हमारे शरीर और मन दोनों को शुद्ध एवं स्वस्थ रखते हैं और इन्हें सक्रिय बनाकर आंतरिक क्रियाओं को सुचारू रूप से संचालित करते हैं | 'स्थिरम सुखम आसनं ' अर्थात आसन हमारे मन और शरीर में स्थिरता लाते  हैं एवं सुख और आनंद की भावना को  जगाते हैं | 

समत्वं योग उच्यते 'परिभाषा योग दर्शन को भलीभांति समझने के लिए पर्याप्त है |जहाँ संतुलन है ,समत्व है ,सामंजस्य है ,लयबद्धता है वहां योग है  | योग पद्धति का उपयोग उपचार पद्धति के रूप में किया जा सकता है किन्तु यह ध्यान रहे कि  योग के लक्ष्य समष्टि से एकात्मकता की उपेक्षा  कदापि न की जाये | स्वामी सत्यानन्द सरस्वती जी के अनुसार "yoga is not an ancient myth buried in oblivion .it is the most valuable inheritence of the present .it is the essential need of today and the culture of tomorrow ."


प्राण का तात्पर्य प्राण ऊर्जा ,प्राण विद्दुत ,जीवनी शक्ति से है 1अध्यात्म एवम  विज्ञान दोनों  इस तथ्य पर एकमत हैं कि प्राण ही जीवन व् चेतना का पर्याय है 1इसके अभाव में समस्त पदार्थ जड़ व मृत माने  जाते हैं 1वनस्पतियों , वृक्षों एवं पुष्पों में प्राण का संचरण सहज रूप में देखा जा सकता है 1इस प्रकार छोटे छोटे जीव  जन्तुओं से लेकर विशालकाय जीवों में प्राण समान रूप से उपलब्ध होता है 1मानव में प्राण  तत्व  सूक्ष्म  एवं रहस्यमय है 1प्राण एक ओर शरीर को नियंत्रित करता है तो दूसरी ओर मन के द्वारा स्वयं नियंत्रित होकर अपने ही विकास को प्रस्तुत करता है 1
प्राण की सर्वब्यापी अभिव्यक्ति के बावजूद मानव ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जहाँ प्राण विद्या अपना यौगिक आधार विकसित करती है 1प्राण का प्रथम कार्य श्वास -प्रश्वास क्रिया का सम्पादन है 1यह अनाहत चक्र को प्रभावित करता है 1इसका स्थान ह्रदय है 1द्वितीय प्राण अपान  है 1 इसका कार्य शरीर के विभिन्न मार्गों से निकलने वाले मलों का निष्कासन करना है और इसका  स्थान गुदा या जननेंद्रिय है 1
प्राण की तृतीय अवस्था को समान प्राण कहा जाता है 1इसके द्वारा  अन्न से लेकर रक्त ,रस और सप्त धातुओं का निर्माण इसी के द्वारा किया जाता है 1इसका मूल स्थान नाभि है जो मणिपुर चक्र को प्रभावित करती है 1प्राण का चौथा आयाम उदान है जिसका कार्य है आकर्षण ग्रहण करना 1अन्न , ,श्वास आदि जो कुछ भी बाहर से ग्रहण किया जाता है वह इसी के द्वारा सम्पन्न होता है 1इसका स्थान कंठ है जो विशुद्धि चक्र को प्रभावित करता है 1व्यान पांचवा प्राण है और इसका कार्य रक्त आदि का संचार तथा स्थानांतरण है 1इसका स्थान सम्पूर्ण शरीर है जबकि कुछ  विद्वान् इसका स्थान नाभि  भी मानते हैं 1यह स्वाधिष्ठान चक्र को प्रभावित करता है 1इन्हीं चक्रों ,ग्रन्थों तथा उपतिकाओं के द्वारा व्यक्तिगत प्राण अन्तरिक्ष के ब्रह्मांडीय प्राण से जुड़ जाते हैं 1यह योग की विभिन्न विधियों से ही सम्भव हो पाता  है  1यही योगविधियाँ प्राण को व्यापक और विकसित करके परिष्कृत करती हैं 1यही यौगिक प्राण विद्या का आधार है जो सही ढंग से अपनाए जाने पर प्राण को शुद्ध करती है 1इसके पश्चात्  प्राणायाम की विधियों के ज्ञान की आवश्यकता पडती है जो प्राण केन्द्रों को व्यवस्थित एवं नियंत्रित करने के साथ प्राण प्रवाह को नियमित भी करती है 1इसके अतिरिक्त धारणा एवं ध्यान की कतिपय  क्रियाएं भी योंगिक  प्राण विद्या के उच्चस्तरीय उद्देश्य को सार्थक बनाती हैं 1यौगिक प्राण विद्द्या की उक्त सभी विधियों द्वारा प्राण ओजस ,तेजस व वर्चस में स्वाभाविक अभिवृद्धि प्रदान करती हैं और अंततः हमें आत्मानुभूति की ओर  अग्रसर करतीं है  1 

योगाभ्यास जिसमें आसन ,प्राणायाम ,ध्यान तीनों सम्मिलित हैं , को प्रारम्भ करते समय किंचित अनिक्षा एवं कठिनाई महशूस हो सकती है किन्तु जैसे जैसे आप दृढ़तापूर्वक इसे करते रहेंगे आपकी उपरोक्त समस्या स्वयं दूर हो जायगी एवं इस दौरान आपको  अतिशय आनंद का अनुभव होगा । मैं स्वयं इस परिस्थिति से गुजर चुका हूँ ।स्वर्ण जयंती पार्क जो सेक्टर- २१, इंदिरा नगर, लखनऊ में स्थित है , में भारतीय योग संस्थान के तत्वावधान में संचालित दैनिक योगाभ्यास को मैं प्रारम्भ में प्रायः   दूर से देखता था ।धीरे धीरे साहस करके एक दिन उनके पास गया और पूरे समय तक बैठकर उसका निरीक्षण  करता रहा और योगाभ्यास समाप्त होने के पश्चात संचालक महोदय  से  योगाभ्यास में  सम्मिलित होने की  अपनी इच्छा निवेदित की । संचालक की स्वीकृति के पश्चात मैं नियमित रूप से योगाभ्यास करने लगा ।प्रारम्भ में कुछ कठिनाई अवश्य महशूस हुई किन्तु धीरे धीरे मुझे इस क्रिया में अत्यधिक आनंद की प्राप्ति होने लगी । अब तो ऐसा लगने लगा है कि दैनिक क्रिया का कोई अन्य कार्य भले छूट जाये किन्तु योगाभ्यास नहीं छूटता है । यदि कभी ऐसा होता भी है तो पूरे दिन यही आभास होता रहता है जैसे कोई महत्वपूर्ण क्रिया छूट गयी है / 

आशा है आप मेरे उपरोक्त अनुभव का अनुसरण करेंगे तथा योगाभ्यास को अपनाकर अपने जीवन को भी  सरल व सुगम बनायेंगे । इस पुस्तक को लिखने का एकमात्र प्रयोजन भी यही है कि जन सामान्य को सरल ढंग से योगाभ्यास के प्रति जागरूक किया जाये और इस क्रिया की  सरलतम विधि से उन्हें परिचित कराया जा सके ।उपरोक्त तथ्यों को दृष्टिगत करते हुए योग के सामान्य सिद्धांतों को सरल एवं कुशलतापूर्वक अपने दैनिक जीवन में लाये जाने के उद्देश्य से इस पुस्तक की रचना की गयी है |  सभी रोगमुक्त हों ,दुर्बल सबल बनें एवं सभी आंतरिक एवं बाह्य दोनों रूप से स्वस्थ हों तथा प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए योग के माध्यम से अपने चरम उद्देश्य की प्राप्ति कर सकें ,यही मेरी अभिलाषा है | मानसिक स्वास्थ्य की आवश्यकता तथा स्वास्थ्य के सूत्रों के माध्यम से पाठकों को उनके सामान्य जीवन में जीने की प्रेरणा दी गयी है जिससे  वे विभिन्न शारीरिक व मानसिक रोगों से सहज  मुक्ति पा सकें |आशा है कि पाठक इससे स्वयं लाभान्वित होंगे तथा  इसमें दी गयी विधियों को प्रामाणिक रूप से समझकर समाज एवं देश का कल्याण करने में पूर्ण समर्थ हो सकेंगे | 
 अंत में मैं भारतीय योग संस्थान, नई दिल्ली का आभार व्यक्त करता हूँ जिनके मार्ग दर्शन में मुझे यह सब सीखने का सुअवसर प्राप्त हुआ । डाo प्रणव पांड्या निदेशक ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान हरिद्वार   का भी मैं विशेष रूप से आभारी हूँ जिनकी प्रेरणा ने मुझे निरंतर  सम्बल प्रदान किया है । ब्रह्मलीन पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ,शांतिकुञ्ज हरिद्वार की पुण्य स्मृति में समर्पित करते हुए सम्प्रति अपने सुधी पाठकों के उपयोगार्थ यह पुस्तक प्रस्तुत कर रहा हूँ /
                                 सर्वे  भवन्तु  सुखिनः  ,सर्वे  सन्तु  निरामयाः  |
                              सर्वे कल्याण पश्यन्तु,मा कश्चिद दुःख भाग्भवेत |