Saturday, 10 March 2012

कपालभाति

कपाल का अर्थ खोपड़ी तथा भाति का तात्पर्य चमक अथवा प्रकाश  होता है । कपालभाति में श्वसन मंद होता है, परन्तु उच्छ्वसन प्रबल होता है ।प्रत्येक उच्छ्वसन के बाद कुम्भक के सूक्ष्म कण होते हैं ।
विधि ;----
१- पद्मासन अथवा सुखासन में सुबिधानुसार आसन पर  बैठ जाएँ ।
२- इस दौरान अपनी पीठ को सीधा  एवं कड़ा रखें ,धड की ओर सिर थोड़ा झुकाए रखें ।जालन्धर बंध लगा लें ।
३- अब दाहिने हाथ को नासिका पर ले जाएँ और अंगूठे को दाहिने नासिका पर एवं अंगुली को बाएं नासिका पर रखते हुए दबाव बनाएं ।
४- बायीं नासिका को पूरी तरह  बंद करें परन्तु दाहिनी नासिका को थोडा खुला रखें ।
५- दाहिनी नासिका से तीव्रता से श्वास भरें और उसी तरह छोड़ें ।यह क्रिया  १०-१२ बार करते रहें ।
६- अब दाहिनी नासिका बंद करें और बायीं नासिका को थोडा खोलें और भस्त्रिका के उतने ही चक्र दुहरायें ।
७- अब नासिका से अँगुलियों को हटा लें ।
८- इस क्रिया को सामर्थ्य के अनरूप ४-५ बार करें ।
९-   गहरी और लम्बी श्वास लें ।
१० -अब अपनी सासों  को सामान्य कर लें एवं श्वसन में लेट जाएँ ।
परिणाम :---
१- इस प्राणायाम से यकृत ,प्लीहा ,पाचनग्रन्थि तथा उदर की मांसपेशियां  अधिक क्रियाशील और शक्तिशाली बन जाती हैं ।
२- पाचनशक्ति बढ़ जाती है तथा भूख अधिक लगने लगती है ।
३- इस प्राणायाम से नासूर बिलकुल सूख जाता है ।
४- आँखों को ठंडक  महशूस होती है और चित्त को प्रसन्नता का अनुभव होने लगता है ।
५- इस प्राणायाम  को नियमित रूप से करने से सर्दी जुकाम की समस्या उत्पन्न नहीं होती है ।  
सावधानी :-- 
१- दुर्बल शरीर अथवा कमजोर व्यक्ति को यह प्राणायाम वर्जित है ।
२- जो कान एवं आँख  की किसी भी प्रकार की समस्या से ग्रस्त हों ,उन्हें भी यह प्राणायाम नहीं करना चाहिए ३- उच्च रक्त चाप अथवा निम्न रक्त चाप के रोगी को भी यह वर्जित है ।
४- यदि नासिका से रक्तश्राव अथवा कान में दर्द का अनुभव होता हो तो इस प्राणायाम को तुरंत रोक दें ।
५- इस प्राणायाम को साफ सुथरे स्थान पर जहाँ शुद्ध वायु मिलती हो करना चाहिए ।

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