Thursday, 27 October 2011

बन्ध, नाडी एवं चक्र

योगासन एवं प्राणायाम के अभ्यास के लिए बन्धों, नाड़ियों एवं चक्रों का ज्ञान आवश्यक होता है | बन्ध का अभिप्राय है बन्धन, एक साथ मिलाना या पकड़ | यह एक प्रकार की शारीरिक स्थिति है जिसमें शरीर के कुछ अवयव या अंगों को सिकोडा अथवा नियंत्रित किया जाता है | नाड़ी का तात्पर्य शरीर की धमनियों से है जिसमें ऊर्जा प्रवाहित होती है | इसी प्रकार चक्र ऐसे वर्तुल हैं जो शरीर में शरीर -यंत्र के संतुलन पहिये हैं |उपर्युक्त तीनों का विस्तारपूर्वक अध्ययन अलग अलग निम्नवत किया जा सकता है |
बन्ध :--- जिस प्रकार विद्दयुत शक्ति को एक निश्चित स्थान पर ले जाने के लिए ट्रासफार्मर ,कंडक्टर ,फ्यूज ,स्विच और इंसुलेटेड वायर की आवश्यकता होती है उसी प्रकार शरीर में प्राण के संचार हेतु ऊर्जा के अपव्यय को रोकने में बन्ध का उपयोग किया जाता है तथा अन्यत्र हानि पहुंचाए बिना ऊर्जा को यथास्थान ले जाने में बन्ध का उपयोग सावधानीपूर्वक किया जाना आवश्यक भी है |
प्राणायाम के लिए महत्वपूर्ण तीन मुख्य बन्ध हैं :---
[१ ] जालन्धर बन्ध:--- जालन्धर बन्ध में गर्दन और गले को संकुचित किया जाता है और चिबुक को  हंसुली और सीने की हड्डी के ऊपरी सिरे के बीच गड्ढे में टिकाया जाता है | इससे रक्तप्रवाह और प्राण को हृदय ,ग्रीवाग्रंथियों तथा मष्तिष्क सहित सिर तक संचालन में सहयोग प्राप्त होता है  |यदि प्राणायाम जालन्धर बन्ध के बिना किया जाता है तो हृदय ,आँख की पुतलियों के पीछे तथा कान के छिद्रों में अनावश्यक दबाव का अनुभव होता है और सिर चकराने लगता है |अतः यह प्राणायाम की तीनों प्रक्रियाओं यथा पूरक [श्वास लेना ],रेचक [श्वास छोड़ना ]और कुम्भक [श्वास रोकना ] में परमावश्यक  हैं |
[२] उड्डियान बन्ध :---उड्डियान बन्ध का अर्थ है ऊपर उड़ना |इस प्रक्रिया में उर प्राचीर को ऊपर वक्षस्थल की ओर उठाया जाता है और अधोउदरीय अवयवों को मेरुदंड की ओर उठाया जाता है |यह रेचक के बाद एक मात्र बाह्य कुम्भक में करना चाहिए अर्थात पूर्ण उच्छ्वसन और नवीन श्वसन के बीच के समय में जब श्वासोच्छ्वास क्रिया रुकी रहती है |अंतर्कुम्भक के समय अर्थात पूर्ण श्वसन और उच्छ्वसन प्रारम्भ करने के बीच के समय जब श्वास रुका रहता है ,उड्डियान बन्ध कदापि नहीं करना चाहिए अन्यथा यह हृदय और उर प्राचीर पर अनावश्यक दबाव डालेगा |
[३ ] मूलबन्ध :---मूल का अर्थ  जड़, श्रोत, प्रारम्भ या बुनियाद है | मूल बन्ध गुदा और अंडकोष की थैली के बीच का भाग है |इस जगह के सिकुड़ने से नीचे की ओर गतिशील अपानवायु हृदयस्थ प्राणवायु के साथ गतिशील होता है |मूल बन्ध पहले अंतर्कुम्भक  में करना चाहिए |नाभि और गुदा के बीच निम्न उदर प्रदेश को रीढ़ की ओर सिकोडा जाता है और उर प्राचीर की ओर खींचा जाता है |उड्डियान बन्ध में गुदा से उर प्राचीर तथा ऊपरी उरोस्थि तक सारा प्रदेश मेरुदंड की ओर पीछे  खींचकर ऊपर उठाया जाता है परन्तु मूलबन्ध में गुदा और नाभि के मध्य का सारा निम्न उदर भाग को सिकोडा जाता है ,मेरुदंड की ओर खींचा जाता है और उर प्राचीर की ओर ऊपर उठाया जाता है |
नाडी :---मनुष्य का शरीर स्वयं में विश्व का एक लघु रूप है |वैसे तो  शरीर में ७२००० नाड़ियाँ हैं किन्तु सुषुम्णा ,पिंगला और इडा तीन मुख्य नाड़ियाँ हैं जिनमें इड़ा और पिंगला क्रमशः सूर्य और चन्द्र का प्रतिनिधित्व करती हैं | पिंगला शरीर के दाहिने और इडा शरीर के बाएं भाग से होकर बहती है |यह क्रमशः दाहिने और बाएं नासिकारन्ध्र से प्रारम्भ होकर नीचे मेरुदंड की ओर जाती है | हमारी श्वास क्रिया इन्हीं दोनों के माध्यम से सम्पन्न होती है। इस प्रकार पिंगला सूर्य नाडी और इडा चन्द्र नाडी कही जाती है |प्रत्येक नाड़ी में में श्वास चलाने का समय दो घण्टे चौबीस मिनट है।एक के बाद दूसरी नाड़ी उतने ही ही समय तक चलती है। इन दोनों के मध्य सुषुम्ना नाडी है जिसे अग्निनाड़ी भी कहा जाता है |सुषुम्ना नाडी जीवन ऊर्जा के बहने का मुख्य मार्ग है और यह मेरुदंड या रीढ़ में स्थित होती है| पिंगला और इडा एक दूसरे से होकर गुजरती हैं और सुषुम्ना भी अनेकों स्थानों पर उनसे होकर गुजरती है | इनके संगम स्थल ही चक्र या पहिये कहलाते हैं |रात और दिन के सन्धिकाल में श्वास सम हो जाती है और श्वास दोनों छिद्रों से चलने लगती है। इसी समय सुषुम्ना नाड़ी प्राण संचालित होता है। इस नाड़ी में श्वास को यदि निरन्तर चलाया जाये और और प्राणायाम द्वारा उस पर नियंत्रण किया जाये तो सुप्त कुंडलिनी स्वतः जागृत हो जाती है। इड़ा और पिंगला की चक्र गति से शरीर में में चक्रों का निर्माण  होता है। 
चक्र :--- इड़ा और पिंगला नाड़ियों की वकगति से चक्रों का निर्माण होता है। मनुष्य के शरीर में कुल सात चक्र होते हैं |ये चक्र शक्तियों के केंद्र होते हैं जिनका भेदन करने पर योगी को विभिन्न प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। शरीर में स्थित मुख्य चक्र एवम उनके प्रभाव निम्नवत हैं। 
मूलाधार चक्र :-यह रीढ़ की हड्डी के निचले छोर से थोडा बाहर की ओर शरीर के निचले भाग में गुदा और लिंग के मध्य चार पंखुड़ियों वाला  यह चक्र स्थित होता है |मनुष्य की चेतना यहीं  स्थि रहती है और अंत में शरीर छोड़ने पर यहीं से समाप्त हो जाती है। यह चक्र निष्कपटता तथा विवेक के देवता श्री गणेश जी द्वारा  संरक्षित व संचालित होता है |कुंडलिनी शक्ति का मूल स्थान मूलाधार चक्र है। मनुष्य तबतक पशुवत है जबतक वह इस चक्र में जीवित रहता है। इसीलिए सम्भोग एवम निद्रा आदि पर नियंत्रण रखते हुए इस चक्र पर ध्यान को केंद्रित करना पड़ता है तभी यह चक्र जागृत हो पाता है। यम और नियम का पालन करते के साक्षी भाव में स्थिर रहकर भी इसे जागृत किया जा सकता है। इसके जागृत होने पर मनुष्य के अंदर वीरता,तेजस्विता और आनंद का संचार होता है। 
स्वाधिष्ठान चक्र :--मूलाधार चक्र जननेंद्रिय  के थोडा ऊपर रीढ़ पर ही यह भी स्थित है |इसकी छह पँखुरियाँ होती हैं यदि मनुष्य की ऊर्जा इस चक्र पर एकत्रित है तो वह आमोद प्रमोद,मनोरंजन,मौजमस्ती लेने वाला। इसकी संरक्षिका माँ सरस्वती व ब्रह्मदेव हैं | यह सौन्दर्यबोध को विकसित करता है |
मणिपुर चक्र :--यह चक्र ह्रदय और नाभि के मध्य उनके ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी पर स्थित होता है | यह रक्तवर्ण का होता है और दस पंखुरियों से युक्त माना जाता है। यदि मनुष्य की चेतना इस चक्र पर एकत्रित हो जाती है तो वह कर्म प्रधान प्रवृत्ति का होता हैजिसे कर्मयोगी कहा  जाता है। इसके अधिष्ठाता श्री विष्णु व लक्ष्मी हैं |
ह्रदय चक्र :--इसे अनाहत चक्र भी कहते हैं जो ह्रदय के ठीक पीछे  स्थित होता है | हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुरियों से यह युक्त होता है।यदि ऊर्जा इस चक्र में एकत्रित होती है तो व्यक्ति सृजनशील होता है। इसके अधिष्ठाता महादेव एवं शक्ति प्रदायिनी  माँ  जगदम्बा हैं |
विशुद्धि चक्र :-सोलह पंखुरियों वाला यह चक्र कंठ भाग में स्थित होता है तथा इसे सरस्वती का स्थान माना जाता है। यह शरीर में फिल्टर के रूप में जाना जाता है |यह अति सम्वेदनशील चक्र वाह्य जीवाणुओं से शरीर की रक्षा करता है क्योंकि यह अन्न प्रणाली प्रदेश में स्थित होता है|इसके जागृत होने पर मनुष्य साधक अथवा त्रिकालज्ञ कहलाता है। 
आज्ञा चक्र :---शरीर के ऊपरी भाग में दोनों भौहों के मध्य चन्दन लगाने वाले स्थान पर यह स्थित होता है |इस  यदि ऊर्जा एकत्रित  जाये तो व्यक्ति कुशाग्र बुद्धिवाला माना जाता है। भृकुटी के मध्य ध्यान को केंद्रित करके साक्षी भाव में स्थित  यह चक्र जागृत होता है। इस स्थल पर अपार सिद्धियां एवम शक्तियां निवास करती हैं। 
सहस्त्रार चक्र :--मनुष्य के मष्तिष्क की खोह में स्थित यह  चक्र सहस्त्र दलों के कमल के रूप में जाना जाता है |यदि मनुष्य यम,नियम का सम्यक पालन करते हुए इस चक्र तक पहुँच जाता है तो वह परमानन्द की प्राप्ति कर लेता है। ऐसे व्यक्ति को सांसारिक वस्तुओं से कोई मतलब नहीं होता है और जीवनमुक्ति  का अधिकारी बन जाता है। यहांतक मूलाधार चक्र से चलकर क्रमशः पहुंचा जा सकता है। 

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